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Saturday, 16 August 2014

गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी

गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगीWorld friendly

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 आईआईएम से लेकर दूसरे मैनेजमेंट स्कूल्स तक में गीता को प्रबंधन की किताब के रुप में पहचान मिली है। गीता दुनिया के उन चंद ग्रंथों में शुमार है जो आज भी सबसे ज्यादा पढ़े जा रहे हैं और जीवन के हर पहलू को गीता से जोड़कर व्याख्या की जा रही है। कुरुक्षेत्र में युद्ध के मुहाने पर खड़ी कौरवों और पांडवों की सेना के बीच भगवान कृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया वो गीता माना गया है।

आखिर गीता में ऐसा क्या है जो उसे इतना पढ़ा जाता है। इसके 18 अध्यायों के करीब 700 श्लोकों में हर उस समस्या का समाधान है जो कभी ना कभी हर इंसान के सामने आती है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (18 अगस्त, सोमवार) के अवसर पर हम आपको कुछ गीता के कुछ चुनिंदा प्रबंधन सूत्रों से रू-ब-रू कराते हैं-


 श्लोक- योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनंजय।           सिद्धय-सिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।

अर्थ- हे धनंजय (अर्जुन)। कर्म न करने का आग्रह त्यागकर, यश-अपयश के विषय में समबुद्धि होकर योगयुक्त होकर, कर्म कर, (क्योंकि) समत्व को ही योग कहते हैं।

मैनेजमेंट सूत्र – धर्म का अर्थ होता है कर्तव्य। धर्म के नाम पर हम अक्सर सिर्फ कर्मकांड, पूजा-पाठ, तीर्थ-मंदिरों तक सीमित रह जाते हैं। हमारे ग्रंथों ने कर्तव्य को ही धर्म कहा है। भगवान कहते हैं कि अपने कर्तव्य को पूरा करने में कभी यश-अपयश और हानि-लाभ का विचार नहीं करना चाहिए। बुद्धि को सिर्फ अपने कर्तव्य यानी धर्म पर टिकाकर काम करना चाहिए। इससे परिणाम बेहतर मिलेंगे और मन में शांति का वास होगा।

मन में शांति होगी तो परमात्मा से आपका योग आसानी से होगा। आज का युवा अपने कर्तव्यों में फायदे और नुकसान का नापतौल पहले करता है, फिर उस कर्तव्य को पूरा करने के बारे में सोचता है। उस काम से तात्कालिक नुकसान देखने पर कई बार उसे टाल देते हैं और बाद में उससे ज्यादा हानि उठाते हैं।

Thursday, 14 August 2014

खुश रहने का सूत्र

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आप अपने सपनों और उच्च महत्त्वाकांक्षाओं को साकार करके अपनी तकदीर फिर से बना सकते हैं।  हर व्यक्ति को जीवन से मिले सबक और चुनौतियां भिन्न होती हैं, और हर व्यक्ति की कहानी के पीछे की कहानी उनकी अपनी है। हालांकि हम सबका सार्वभौमिक लक्ष्य यह जानना है कि हम सब में ईश्वर का अक्श है। इसका मतलब यह है कि हम में सब तरह के दुखों से निवृत्त होने की क्षमता है और हम अतिमानव (सुपरह्यूमन) स्तर की शांति, प्रेम, विवेक और खुशी प्राप्त कर सकते हैं। हम अपने ऊंचे सपनों और महत्वाकांक्षाओं को साकार करके अपनी तकदीर फिर से बना सकते हैं, पर इसके लिए इच्छाशक्ति का होना आवश्यक है। हममें केवल खुद की तकदीर बनाने की क्षमता ही नहीं है, बल्कि उनकी भी बना सकते हैं, जिनसे हम प्यार करते हैं-हमारा समुदाय, हमारा राष्ट्र, हमारी दुनिया। संक्षेप में कहें, तो हम ईश्वर हैं।   मैं ईश्वर! यदि हम ईश्वर हैं, तो पृथ्वी पर हमारा जीवन निर्वाण जैसा क्यों नहीं है, जहां सबके पास जरूरत के साधन हैं, जहां सबके लिए न्याय और स्वतंत्रता है, और जहां हर व्यक्ति अपने ऊंचे सपनों को साकार करने में व्यस्त है, सबके साथ, आनंद के साथ? जवाब आसान है: हमने पृथ्वी पर निर्वाण की रचना नहीं की है क्योंकि आप, और इस पृथ्वी के अधिकांश लोग नहीं मानते कि ऐसा संभव है। क्योंकि आपके दिमाग में यह बात बैठी हुई है कि आप गलतियां करते हैं, कमजोर हैं और मरणशील हैं। इसी वजह से विवेकानंद ने कहा था, 'ब्रह्मांड की सभी शक्तियां पहले से हमारी हैं। यह हम हैं, जिन्होंने अपने हाथों से अपनी आंखों को ढक रखा है और चिल्ला रहे हैं कि अंधेरा है।Ó दरअसल बात यह है कि यदि आप निश्चित तौर पर जानते हैं कि आप ईश्वर हैं और ऐसा बनने की आपमें शक्तियां हैं, तो आप इसी क्षण निर्वाण की स्थिति में होते, क्योंकि जो आप सोचते हैं, जैसा आप सोचते हैं-आपके भाव, विचार, मान्यताएं और उम्मीदें-वही आपको जिंदगी में मिलता है और उसी से आप अपनी तकदीर लिखते हैं।  जैसा सोचेंगे वैसा बनेंगे अधिकांश लोगों की मान्यता के विपरीत, हमारे विचार केवल हमारे मन तक सीमित नहीं रहते। ये सूक्ष्म क्वांटम या सूक्ष्म ऊर्जा-इलैक्ट्रोमैज्नेटिक ऊर्जा-के फॉर्म में रहते हैं, जो हमारे शरीर में और बाहर दुनिया में असाधारण दूरियों तक सुपर-ल्यूमिनल गति से प्रवाहित होते हंै, तुरंत, बिना एक पल खोए। ऊर्जा सदैव अपने जैसी ऊर्जा को आकर्षित करती है: नकारात्मक विचार तनावपूर्ण घटनाओं और तकलीफदेह लोगों को आकर्षित करते हैं, जबकि अच्छे विचार प्यार, खुशी और सफलता को आकर्षित करते हैं। यह वैज्ञानिक तथ्य है, जो क्वांटम फिजिक्स और सूक्ष्म ऊर्जा मेडिसिन के क्षेत्र में शताब्दी से अधिक समय के शोध-कार्यों से प्रमाणित है। और हाल में जोंस हॉपकिंस यूनिवर्सिटी की बे्रन इमेजिंग स्टडीज ने भी इसे माना है। इसीलिए बुद्ध ने कहा था, 'मन सबकुछ है। आप जो सोचते हैं, बनते हैं। यूनानी दार्शनिक सुकरात और उनके शिष्य प्लेटो दोनों इससे सहमत थे। उनका कथन था, 'जैसा आप सोचेंगे, वैसा बनेंगे।  जो बात पांच हजार साल पहले प्राचीन ऋषि और ऋषिका जानते थे, उसे विज्ञान ने बिना किसी शक के प्रमाणित कर दिया है: पदार्थ ऊर्जा से निर्मित है और ऊर्जा विचारों से शासित है। आपके विचार, आपका भविष्य बना रहे हैं, जिसे आप समय बीतने के साथ-साथ अनुभव कर रहे हैं। आप क्या हैं, और आप क्या कर सकते हैं, इसके बारे में संकीर्ण विचार मामूली भविष्य बनाएगा और कष्टों का अंबार लगा देगा। जीवन से बड़ी सोच..यानि ऊंचे विचार, जो यथार्थता की परिधि में हैं, आपकी ऊंची महत्वाकांक्षाओं के अनुकूल आपकी तकदीर बनाएंगे।    एक साधारण तथ्य कि पदार्थ ऊर्जा से निर्मित है और ऊर्जा विचारों से शासित है-कर्मों का संचालन करता है। अपनी सोच पर अधिकार करें, और आप अपने कर्म पर नियंत्रण करने में सक्षम हो जाएंगे। इसी  दिशा में सोचें, आप अपनी सर्वोच्च उम्मीदों और सपनों को एक नए अवतार...कष्टों से मुक्ति के लिए साकार कर सकेंगे। यह सच में सहज है। हालांकि मनाव मन उतना सरल नहीं है। यह जटिल मशीन है, जिसमें आपके विचार, भावनाएं, मान्यताएं और उम्मीदें काफी मात्रा में अवचेतन मन में चलती रहती हैं, जहां आप बिना सही साधन के नहीं पहुंच सकते हैं।    सकारात्मक सोच कुछ सालों पहले एक किताब- 'द सीक्रेटÓ विश्वभर में बेस्टसेलर रही। यह किताब इसी वैज्ञानिक आधारवाक्य पर है- पदार्थ ऊर्जा से निर्मित है और ऊर्जा विचारों से शासित है। किताब का दावा था कि आप जो चाहते हैं उसे प्राप्त कर सकते हैं, केवल उसके बारे सोचकर या कल्पना करके कि वह आपके पास पहले से है। हालांकि किताब ने पाठकों को काफी निराश किया था, जिन्होंने अपना सबकुछ अपनी इच्छित वस्तुओं-सेहत, संपत्ति, प्यार और इसी तरह की चीजों को पाने के लिए ऐसी 'सकारात्मक सोचÓ में लगाया, लेकिन कोई परिणाम नहीं मिला। यदि इस किताब का आधारवाक्य सही है, और मैं विश्वास दिलाता हूं कि है, तो इन पाठकों ने ऐसा क्यों पाया कि केवल सकारात्मक सोच से इच्छित परिणाम नहीं मिल सकते? जवाब आसान है: मन की जिस अवस्था-चेतनावस्था-को वे काम में ले रहे थे, वह सबसे कमजोर, मन का सबसे छोटा हिस्सा थी। यदि आप कष्टों से मुक्ति चाहते हैं, सपने साकार करना चाहते हैं, तो आपको मन की हर अवस्था तक पहुंच करनी होगी और सोच को वहां तक ले जाना होगा।  अधिकांश लोग केवल चेतन मन के बारे में सजग रहते हैं-उसके रोजमर्रा के विचार, भाव, मान्यताएं और प्रवृत्तियां-लेकिन मन की और अवस्थाएंं भी हैं, जो उससे काफी सशक्त हैं, जिस स्तर पर आप लगातार सोचते रहते हैं, लेकिन आपको मालूम नहीं रहता है। चेतन मन के पीछे अचेतन मन छिपा रहता है और आप उसे काफी जीते हैं। फिर है उच्च चेतना की विशालता, जिसे लोग सामान्यतया 'आत्माÓ कहते हैं। हर व्यक्ति को इस उच्च चेतना की जानकारी होती है और इसकी शक्ति अनंत है। आप अपनी कुछ कहानी अपनी  सर्वोच्च महत्वाकांक्षाओं  के रूप में जीते हैं-इसकी 'जानकारीÓ कि आप यहां क्यों हैं और जो पवित्र है, उसे पाने की ललक रहती है।हम सबमें मन की अवचेतन और उच्च चेतन की अवस्था में ज्ञान और ऊर्जा का अंतहीन भंडार है, जिसमें तन-मन को स्वस्थ रखने, रोजमर्रा की चुनौतियों को जीतने और पूर्ण संतुष्टि और आनंद के साथ असाधारण जीवन को जारी रखने की योज्यता होती है। आपको अपने मन के इन छिपे आयामों के संपर्क में रहना चाहिए।    सफलता के तीन सूत्र अपनी कहानी के पीछे की कहानी, कष्टों से मुक्त जिंदगी जीने की क्षमता के लिए तीन बातें आवश्यक हैं। सही नजरिया: आप सपने लेने का साहस करें। आप रोमांचक जीवन जीने के मकसद से मनुष्य शरीर में जन्मे ईश्वर हैं। वो जिंदगी, जो पूर्ण संतोष, तालमेल, प्यार और खुशियों से भरपूर है।स्वतंत्रता पाएं: आप कौन हैं, क्या कर सकते हैं, और कैसे अपनी और दूसरों की जिंदगी बेहतर हो सकती है, के बारे में जिन बातों ने आपकी मान्यताओं और उम्मीदों को विकृत किया है, ये विकृत अनुकूलित आदतें आपके कर्म को गाइड करती हैं। इससे आप कष्टों के लिए अतिसंवेदनशील बने रहते हैं और आप अपनी अंतहीन संभावनाओं को नहीं पहचान पाते हैं। इनसे मुक्ति पाना जरूरी है।  अपनी शक्ति का दावा: आप अपने मन की उच्च चेतना की अवस्था तक अपनी पहुंच बनाएं, जहां आप अपनी सर्वोत्तम तकदीर को समझ सकेंगे, और वह शक्ति जो इसे बनाने के लिए आवश्यक है। इस शक्ति से आप किसी भी उच्च आकांक्षा तक पहुंच सकते हैं और रास्ते में आने वाले कष्टों सहित सभी अवरोधों पर जीत हासिल कर सकते हैं।      

Saturday, 21 June 2014

भगवान श्रीकृष्ण का लीलामय जीवन 

भगवान श्रीकृष्ण का लीलामय जीवन अनके प्रेरणाओं व मार्गदर्शन से भरा हुआ है। उन्हें पूर्ण पुरुष लीला अवतार कहा गया है। उनकी दिव्य लीलाओं का वर्णन श्री व्यास ने श्रीमद्भागवत पुराण में विस्तार से किया है। भगवान श्रीकृष्ण का चरित्र मानव को धर्म, प्रेम, करुणा, ज्ञान, त्याग, साहस व कर्तव्य के प्रति प्रेरित करता है। उनकी भक्ति मानव को जीवन की पूर्णता की ओर ले जाती है।भाद्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी को देश व विदेश में कृष्ण जन्म को उत्सव के रूप में मनाया जाता है। उनका जन्म बुधवार को मध्यरात्रि में हुआ। उनके जन्म के समय वृषभ लग्न था व चंद्रमा वृषभ राशि में था। रोहिणी नक्षत्र में जन्मे कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन विविध लीलाओं से युक्त है। कृष्ण भारतीय जीवन का आदर्श हैं और उनकी भक्ति मानव को उसके जीवन की पूर्णता की ओर ले जाती है। भगवान विष्णु के कुल 24 अवतारों के क्रम में कृष्ण अवतार का क्रम 22वां है। धरती पर धर्म की स्थापना के लिए ही द्वापर में भगवान विष्णु कृष्ण के रूप में मथुरा के राजा कंस के कारागार में माता देवकी के गर्भ से अवतरित हुए। उनका बाल्य जीवन गोकुल व वृंदावन में बीता। NDगोकुल की गलियों में व मां यशोदा की गोद में पले-बढ़े कृष्ण ने अपनी बाल्यावस्था में ही अपने परम ब्रह्म होने की अनुभूति से यशोदा व बृजवासियों को परिचित करा दिया था। उन्होंने पूतना, बकासुर, अघासुर, धेनुक और मयपुत्र व्योमासुर का वध कर बृज को भय मुक्त किया तो दूसरी ओर इंद्र के अभिमान को तोड़ गोवर्धन पर्वत की पूजा को स्थापित किया।बाल्य अवस्था में कृष्ण ने न केवल दैत्यों का संहार किया बल्कि गौ-पालन उनकी रक्षा व उनके संवर्धन के लिए समाज को प्रेरित भी किया। उनके जीवन का उत्तरार्ध महाभारत के युद्ध व गीता के अमृत संदेश से भरा रहा। धर्म, सत्य व न्याय के पक्ष को स्थापित करने के लिए ही कृष्ण ने महाभारत के युद्ध में पांडवों का साथ दिया। महाभारत के युद्ध में विचलित अपने सखा अर्जुन को श्रीकृष्ण ने वैराग्य से विरक्ति दिलाने के लिए ही गीता का संदेश दिया। गीता का यह संदेश आज भी पूरे विश्व में अद्वितीय ग्रंथ के रूप में मान्य है। भगवान कृष्ण ने जहां अभिमानियों के घमंड़ को तोड़ा, वहीं अपने प्रति स्नेह व भक्ति करने वालों को सहारा दिया। राज्य शक्ति के मद में चूर कौरवों के 56 भोग का त्याग कर भगवान कृष्ण ने विदुर की पत्नी के हाथ से साग व केले का भोग ग्रहण कर विदुराणी का मान बढ़ाया। द्वारका का राजा होने के बाद भी उन्होंने अपने बाल सखा दीन-हीन ब्राह्मण सुदामा के तीन मुट्ठी चावल को प्रेम से ग्रहण कर उनकी दरिद्रता दूर कर मित्र धर्म का पालन किया।

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